लोकतंत्र

तुम भीड़ के साथ जीना सीख लो
ये भीड़ ही अब समाज है,

तुम भीड़ के साथ चलना सीख लो
ये भीड़ ही अब रिवाज़ है

तुम भीड़ की तरह सोचना सीख लो
ये भीड़ ही अब विचार है,

तुम भीड़ की तरह बोलना सीख लो
ये भीड़ ही अब आवाज़ है |


तुम अराजकता हो
निडर, स्वछन्द, भावुक |

मैं लोकतंत्र हूँ
समझदार, समावेशी, तार्किक |

आओ हम प्रेम करे |


In memory of dissent
I chose to remain silent.

In memory of freedom
I chose to remain enslaved.

In memory of democracy
I chose to remain majority.

In memory of tolerance
I chose to remain intolerant.

In memory of love
I chose to remain hateful.

I am public.


वो कहते है सवाल मत करो
खराब संस्कृति है

उन्हें शायद ये नहीं मालूम
सवाल न करना

मुर्दों की प्रवृति है |


Navigating between politics, philosophy, and literature.